बचपन में जब कोई मेरा रिश्तेदार मेरे यहां आता था तो हम लोगों के लिए खाने पीने का कुछ न कुछ सामान जरूर लाता था l उस में मिठाई, फल , गुड से बनी हुई पट्टी और मुर्मूइया भी होती थी l अरे उस समय मुझे कोई कुछ भी दे देता था या नगद एक आध रुपये पैसे तो बहुत खुशी होती थी l इसके अलावा मेरे पिताजी बाजार से हम लोगों के लिए खाने पीने की कोई चीज लाते थे तो उसको देखकर जो खुशी मिलती थी उतनी खुशी खाने से नहीं मिलती थी l उस चीज़ को लेकर के बड़े चटकारे मार करके हम लोग गलियों में खाते थे l होली, दिवाली में जब हमारे लिए कपड़े बनते, जूते – चप्पल आती, खिलौने आते या अन्य कोई भी सामान , कहने का मतलब यह है कोई भी ऐसा सामान जो हमारे खाने या पहनने लायक होता तो उसको देखकर उस समय जो हमें खुशी मिलती थी l वह खुशी आज हमारे बच्चों को नहीं मिलती l हम लोग नंगे पैर पढ़ने जाते थे, आग ताप – ताप करके जाड़ा बिताते थे l अपने लंगोटी यारो के साथ बिना किसी खिलौने के, कबड्डी, लुकाछिपी, गुल्ली- डंडा, सीपसार, ऊँच नीच, अंधेरी उजेरी आदि खेलों को खेला करते थे l जिसमें एक भी पैसे का खर्चा नहीं होता था l लेकिन खुशी इतनी होती थी कि उस की 10% खुशी भी आज हमारे बच्चों के चेहरों पर नहीं दिखती l उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए सुबह से लेकर शाम तक, दिन हो या रात मोबाइल से चिपकने में ही वह अपना भला और खुशी समझते हैं l बात 6 फरवरी 2023 की है l मैं अपने स्कूल के एक शिक्षक की बारात में रायबरेली गया था l तो वहां से बच्चों के लिए दूध वाली 2 किलो बहुत अच्छी मिठाई, गांव से हरा देशी मटर और मूंगफली लेकर के आया l जब रात को 11:00 बजे घर पहुंचा तो दोनों बच्चे भी एक दावत खाकर करके घर वापस आए l मैंने उनसे कहा कि देखो य़ह मिठाई बहुत ही अच्छी और स्वादिष्ट है l इसको दूध वाली मिठाई कहते हैं, जरा इसे खा कर तो देखो कितनी अच्छी है l दोनों बच्चों ने 15 कोने का मुंह बनाया और अपना – अपना मोबाइल लेकर के अपने – अपने कमरे में चले गए l मैं कितनी शौक से मिठाई को लेकर आया था l देशी मटर जिसका होरा भुनना था कल l वह इतनी अच्छी थी कि रायबरेली के शिव गढ़ गांव में लेने के बाद मैंने लगभग आधा किलो मटर वहीं पर खा ली थी l सोचा था घर ले जाएंगे, उसको भूनेगे, बच्चे खाएंगे तो उनको मजा आएगी l लेकिन बच्चों के खाने की तो बात छोड़िए, उसे देखा तक नहीं, उनके चेहरे पर खुशी नाम की चीज ही नहीं थी l होरा तो वह कभी नहीं खाते, कहते हैं कि हांथ, मुँह काला हो जाता है l य़ह दृश्य देखकर मैं अपने बचपन में खो गया l उस समय अगर पिताजी अमरुद ले आते थे तो इतना मन खुश होता था कि उसको ले कर के गांव में घूम घूम कर खाता था, अपने मित्रों को दिखाता था l झाड़ियों से बेर तोड़कर के लाता था, आप सोच सकते हैं कि बेर के पेड़ में कितने कांटे होते हैं l कितनी मेहनत से डंडा मार मार के तोड़ा करते थे और जब वह कच्चा – पक्का कैसा भी मिलता था, तब वह खुशी से बेर खाते थे l लेकिन आज हम अपने घर में चाहें जितना महंगा सामान ले आए, बच्चों के लिए स्कूटी ले आए, होली- दिवाली और नए वर्ष में हमारे कुछ शुभचिंतक मित्र मुझे अच्छी-अच्छी मिठाई भेंट करते हैं l लेकिन उस मिठाई या सैकड़ों रुपये की डायरी और गुलदस्ते को देख कर के मेरे बच्चों के चेहरे पर वह खुशी नहीं आती जो मुझे आती है l डायरियों का तो वह महत्व ही नहीं समझते l हम लोगों के लिए मिठाई से अच्छी तो डायरियां और पुस्तके होती हैं lआज माता पिता के आशीर्वाद से मेरे पास सब कुछ है पैसा को छोड़ कर के l एक लेखक, विद्यालय प्रबंधक, साहित्यकार, पत्रकार और घुमक्कड़ होने के नाते पूरे देश और विदेशों से लोगों का आशीर्वाद मुझ को मिलता है l उनके द्वारा बढ़िया-बढ़िया पुस्तकें, मिष्ठान और अन्य सम्मान प्रेषित किए जाते हैं l लेकिन उन सब को देख कर के मेरे बच्चों में वह खुशी नहीं दिखती जो बचपन में मुझे दिखती थी l मैं सोचता रहता हूं ऐसा क्यों होता है l लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि आज के बच्चे क्या चाहते हैं l