रिपोर्ट :- आकाश मिश्रा. ओम
बहराइच। उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद से एक ऐसी शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे शिक्षा विभाग के दावों और सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जहाँ एक ओर सरकार ‘सर्व शिक्षा अभियान’ और ‘पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया’ जैसे नारों पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, वहीं दूसरी ओर गरीब बच्चों के हक की नि:शुल्क पाठ्यपुस्तकें स्कूलों के बजाय कबाड़ के गोदामों में कौड़ियों के भाव बिक रही हैं।

हैरानी की बात यह है कि जिन नई नवेली किताबों पर ‘बिक्री के लिए नहीं’ की मुहर लगी है, वे भारी मात्रा में तराजू के पलड़ों पर तौली जा रही हैं। यह सिर्फ कागज की रद्दी का ढेर नहीं, बल्कि उन हजारों मासूमों के सुनहरे भविष्य का कत्ल है जो किताबों के अभाव में फटे बस्ते लेकर स्कूल की चौखट चूमते हैं।
स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कबाड़ के गोदामों में इन किताबों का मिलना एक बड़े और संगठित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। सवाल यह उठता है कि जो किताबें बच्चों के हाथों में ज्ञान की रोशनी बिखेरनी थीं, वे अंधेरे गोदामों में ‘राम नाम सत्य’ की तर्ज पर अपनी दुर्दशा पर आंसू क्यों बहा रही हैं?
जनपद के जागरूक नागरिकों में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश व्याप्त है।
अभिभावकों का कहना है कि सत्र शुरू होने के महीनों बाद भी बच्चों को किताबें नहीं मिलतीं, जबकि वही किताबें बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र की मिलीभगत से रद्दी बन रही हैं। यह घटना चीख-चीख कर पूछ रही है कि आखिर इस महापाप का जिम्मेदार कौन है?
अब पूरे जनपद की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस बड़े खुलासे के बाद जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागते हैं या इस मामले को भी रद्दी की पुरानी फाइलों की तरह दबा दिया जाएगा। क्या इन किताबों के सौदागरों पर कभी कोई ठोस नजीर पेश करने वाली कार्रवाई होगी
