निलंबित बीएसए के खिलाफ भ्रष्टाचार जांच ठप, 50 दिन बाद भी गिरफ्तारी नहीं

सीओ सिटी बोले– शिक्षा विभाग नहीं कर रहा सहयोग

गोंडा। जनपद में परिषदीय विद्यालयों में डेस्क–बेंच आपूर्ति के लिए चयनित फर्म से 2.25 करोड़ रुपये कमीशन मांगने के गंभीर आरोपों में फंसे निलंबित जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) अतुल कुमार तिवारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच फिलहाल ठंडे बस्ते में पड़ी दिखाई दे रही है।

मामला दर्ज हुए 50 दिन बीत जाने के बावजूद अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। इस प्रकरण में नगर कोतवाली में निलंबित बीएसए अतुल कुमार तिवारी सहित तीन आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। जांच की जिम्मेदारी सीओ सिटी आनंद राय को सौंपी गई है, लेकिन जांच की रफ्तार पर सवाल उठने लगे हैं।

शिक्षा विभाग पर जांच में अड़ंगा डालने का आरोप

पुलिस का साफ कहना है कि शिक्षा विभाग जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। टेंडर प्रक्रिया से जुड़ी फाइलें, अभिलेख और दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए विभाग को कई बार नोटिस भेजे गए, लेकिन अब तक जरूरी कागजात पुलिस को नहीं मिले हैं। इससे जांच प्रभावित हो रही है और कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है।

निलंबित बीएसए को कोर्ट से नहीं मिली कोई राहत

निलंबित बीएसए अतुल कुमार तिवारी ने अपने निलंबन को चुनौती देते हुए लखनऊ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी। वहीं एंटी करप्शन कोर्ट, गोरखपुर से भी उन्हें अग्रिम जमानत नहीं मिल सकी। इसी मामले में सह-आरोपी जिला समन्वयक प्रेम शंकर मिश्रा की अग्रिम जमानत याचिका भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है।

मामले के वादी मनोज कुमार पांडे ने पुलिस कार्रवाई पर नाराजगी जताते हुए कहा कि शासन स्तर पर कार्रवाई हो चुकी है, लेकिन पुलिस अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी है। उन्होंने दावा किया कि सभी साक्ष्य, दस्तावेज और बयान पुलिस को सौंपे जा चुके हैं। वादी का आरोप है कि शिक्षा विभाग जानबूझकर जांच में सहयोग नहीं कर रहा, क्योंकि विभाग के ही कई अधिकारी और कर्मचारी इस पूरे घोटाले में शामिल हैं।

सीओ सिटी आनंद राय ने बताया कि मामले की जांच लगातार जारी है। शिक्षा विभाग को कई बार नोटिस भेजे गए हैं और एक बार फिर आवश्यक अभिलेख उपलब्ध कराने के लिए पत्राचार किया गया है। उन्होंने कहा कि जांच पूरी कर न्यायालय में रिपोर्ट दाखिल की जाएगी।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब अदालतें राहत देने से इनकार कर चुकी हैं और मामला करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार से जुड़ा है, तो फिर गिरफ्तारी में हो रही देरी और विभागीय चुप्पी क्यों? अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग कब तक जांच में सहयोग करता है और पुलिस कब तक इस हाई-प्रोफाइल मामले में ठोस कार्रवाई कर पाती है।

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