मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले का सौंदवा ब्लॉक, जो कभी घने जंगलों और समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता था, आज एक बार फिर हरियाली की ओर लौटता दिखाई दे रहा है। इस परिवर्तन के पीछे किसी बड़ी सरकारी योजना का नहीं, बल्कि स्थानीय भील आदिवासी महिलाओं के अदम्य साहस, एकजुटता और प्रकृति के प्रति गहरी संवेदनशीलता का हाथ है। अट्टा गाँव की दहेली बाई और उनकी साथी महिलाएँ आज “वनरक्षक” के रूप में जानी जाती हैं, जिन्होंने अपने प्रयासों से न केवल जंगलों को बचाया, बल्कि अपने समुदाय के जीवन को भी संवार दिया।

यह कहानी केवल पर्यावरण संरक्षण की नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की भी है। दहेली बाई बताती हैं कि जब शहरों की जरूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों की अंधाधुंध कटाई की गई और इसका दोष आदिवासियों पर डाल दिया गया, तो उन्हें गहरा आक्रोश हुआ। यह वही क्षण था जब उन्होंने तय किया कि अब वे चुप नहीं बैठेंगी। उन्होंने गाँव की महिलाओं को इकट्ठा किया और पहाड़ियों तथा जंगलों की रक्षा का बीड़ा उठाया।
अलीराजपुर का यह क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से काफी संवेदनशील है। यहाँ की मिट्टी पतली है, जिसके नीचे कठोर बेसाल्ट चट्टानें पाई जाती हैं। औसत वर्षा लगभग 900 मिलीमीटर होती है, जो मुख्यतः जून से अक्टूबर के बीच होती है। ऐसे में जंगलों की उपस्थिति यहाँ के जल चक्र और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। जब जंगल कटने लगे, तो इसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ा—मिट्टी का कटाव बढ़ा, जलस्रोत सूखने लगे और खेती प्रभावित हुई।भील आदिवासी सदियों से इस क्षेत्र में रहते आए हैं और उन्होंने इस कठिन पर्यावरण में भी अपने जीवन को संतुलित ढंग से ढाला है।
वे जंगलों से केवल आवश्यक संसाधन—जैसे लकड़ी, घास और जड़ी-बूटियाँ—ही लेते थे और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलते थे। लेकिन जब 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद यह क्षेत्र वन विभाग के अधीन आया, तो जंगलों का व्यावसायिक दोहन शुरू हो गया। लकड़ी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ा।
जंगलों के नष्ट होने का सबसे अधिक असर स्थानीय समुदाय की आजीविका पर पड़ा। खेती की उत्पादकता घट गई, वन-उत्पादों की उपलब्धता कम हो गई और जल संकट गहरा गया। इसके साथ ही, वन कानूनों के तहत आदिवासियों को अपने ही जंगलों में प्रवेश के लिए प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। उन्हें कई बार वन अधिकारियों को रिश्वत देने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे उनका जीवन और कठिन हो गया।
इन्हीं परिस्थितियों में 1980 के दशक में आदिवासियों ने अपने अधिकारों के लिए संगठित होना शुरू किया। “खेदुत मजदूर चेतना संगठन” जैसे समूहों ने इस आंदोलन को दिशा दी। लेकिन इस पूरे संघर्ष में महिलाओं की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण रही। उन्होंने न केवल जंगलों की रक्षा का जिम्मा उठाया, बल्कि अपने समुदाय को भी जागरूक किया।दहेली बाई और उनकी साथियों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि कोई भी व्यक्ति बिना अनुमति के पेड़ न काटे। उन्होंने जंगलों की निगरानी के लिए समूह बनाए और बारी-बारी से पहरा देना शुरू किया।
यदि कोई व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करता, तो उसे सामुदायिक दंड दिया जाता। इसके साथ ही, उन्होंने नए पेड़ लगाने और प्राकृतिक पुनर्जीवन को बढ़ावा देने के प्रयास भी किए।
इन प्रयासों का परिणाम धीरे-धीरे सामने आने लगा। जिन पहाड़ियों पर कभी बंजरपन छा गया था, वहाँ फिर से हरियाली लौटने लगी। सूख चुके झरनों में पानी आने लगा और जलस्तर में सुधार हुआ। इससे खेती की स्थिति भी बेहतर हुई और लोगों की आजीविका में स्थिरता आई। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि यदि स्थानीय समुदाय को संसाधनों का संरक्षण करने का अधिकार और जिम्मेदारी दी जाए, तो वे बेहतर परिणाम दे सकते हैं।
इस आंदोलन का एक और महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं का नेतृत्व है। पारंपरिक रूप से ग्रामीण और आदिवासी समाज में महिलाओं को सीमित भूमिका दी जाती रही है, लेकिन यहाँ उन्होंने नेतृत्व संभालकर यह साबित किया कि वे परिवर्तन की सबसे बड़ी ताकत बन सकती हैं। उन्होंने न केवल पर्यावरण की रक्षा की, बल्कि समाज में अपनी पहचान भी स्थापित की।
आज अलीराजपुर की ये वनरक्षक भील महिलाएँ पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन चुकी हैं। उनका यह प्रयास यह दर्शाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं, बल्कि जनसहभागिता से संभव है। जब लोग अपने परिवेश और संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी महसूस करते हैं, तो वे असंभव लगने वाले कार्यों को भी संभव बना सकते हैं।यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है। यदि केवल आर्थिक लाभ के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया जाए, तो उसका खामियाजा अंततः समाज को ही भुगतना पड़ता है। वहीं, यदि स्थानीय ज्ञान और परंपराओं का सम्मान करते हुए संसाधनों का उपयोग किया जाए, तो सतत विकास संभव है।
अंततः, वनरक्षक भील महिलाओं का यह संघर्ष हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—प्रकृति की रक्षा केवल सरकार या किसी संस्था की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी का कर्तव्य है। यदि हर व्यक्ति अपने स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयास करे, तो हम एक हरित और संतुलित भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।अलीराजपुर की इन साहसी महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति, एकता और सही दिशा में प्रयास की आवश्यकता होती है। उनका यह संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बना रहेगा और हमें यह याद दिलाता रहेगा कि जब समाज की महिलाएँ जागृत होती हैं, तो वे न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे पर्यावरण और भविष्य को सुरक्षित कर सकती हैं।
वरुण कुमार
लेखन एवं कवि
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