रांची | 16 दिसंबर 2025
झारखंड में विकास और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच संवैधानिक न्याय आज कठघरे में खड़ा है। इस्लामनगर में उजड़े परिवारों को जहाँ प्रशासन ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आंशिक राहत और अस्थायी आश्रय दिया, वहीं रिम्स परिसर के आसपास रहने वाले सैकड़ों गरीब परिवार खास कर दलित आदिवासी मूलवासी समाज जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग शामिल हैं एक ही झटके में बेघर कर दिए गए।
ठिठुराती सर्दी में बिना वैकल्पिक व्यवस्था के यह कार्रवाई समानता और मानवीय गरिमा के संवैधानिक सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
उपरोक्त बाते आज आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केन्द्रीय उपाध्यक्ष सह पूर्व विधायक प्रत्याशी विजय शंकर नायक ने कही | इन्होने आगे कहा की अनुच्छेद 14 समान परिस्थितियों में समान व्यवहार की गारंटी देता है। इस्लामनगर को मिला आंशिक पुनर्वास, रिम्स विस्थापितों की पुकार अनसुनी कर दी गई |

रांची में अतिक्रमण हटाने के दो मामले – इस्लामनगर और रिम्स परिसर – दिल दहला देने वाली सच्चाई उजागर करते हैं। एक तरफ इस्लामनगर के परिवार, जो 2011 में बेघर हुए, कोर्ट की मानवीय दृष्टि से आंशिक पुनर्वास मिला था । क्या एक ही राज्य में न्याय के दो मापदंड होंगे? दोनों मामले कानून की नजर में अतिक्रमण हैं, लेकिन अंतर कोर्ट के विवेक और मामले की प्रकृति से आया।मानवीय रूप से दोनों में गरीब परिवार प्रभावित हैं एक में आंशिक न्याय, दूसरे में पूर्ण बेबसी जो समाजिक न्याय के सिधान्तो की उपेक्षा करता है |
श्री नायक ने आगे कहा की रिम्स के सैकड़ों परिवार रातों रात उजाड़ दिए गए – ठंड की क्रूर सर्दी में बच्चे काँप रहे हैं, माँएँ आंसू बहा रही हैं, बुजुर्ग बेबस होकर आसमान ताक रहे हैं। हाईकोर्ट ने अस्पताल सुधार को प्राथमिकता दी, लेकिन इन मासूमों की चीखें अनसुनी रह गईं।क्या कानून की रक्षा गरीबों की आहों पर ही होगी? दोनों ही मामले गरीबी की मजबूरी से उपजे, दोनों में मासूम बच्चे और मेहनतकश लोग प्रभावित हुए ।
इस्लामनगर में कोर्ट ने इंसानियत को जगह दी, तो रिम्स में क्यों नहीं हुआ ? ये परिवार झारखंड के अपने हैं – क्या उनकी पीड़ा कम है ? मैं झारखंड सरकार और माननीय हाईकोर्ट से दिल से अपील करता हूँ –की रिम्स विस्थापितों की भी पुकार को सुनी जाय और तुरंत अस्थायी आवास और पुनर्वास की व्यवस्था करने की दिशा में ठोस पहल किये जाय । इस्लामनगर की तरह मानवीय हस्तक्षेप से इन लोगो की भी आंसुओं को पोंछिए। विकास जरूरी है, लेकिन गरीबों की गरीबी और बेबसी पर नहीं। यह इंसानियत का समय है – सभी को समान न्याय मिले आज इसकी जरूरत है |
