यह घटना कोई साधारण संसदीय विवाद नहीं है, बल्कि मोदी सरकार द्वारा भारतीय लोकतंत्र की जड़ों पर किया गया एक सुनियोजित और खुला हमला है।

लोकसभा, जो भारत के संविधानिक ढांचे का सबसे पवित्र मंदिर मानी जाती है, आज नरेंद्र मोदी की सत्ता-लालसा और असहिष्णुता का अखाड़ा बन चुकी है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान बोलने से रोका जाना मात्र एक व्यक्तिगत अपमान नहीं—यह पूरे विपक्ष की, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की आवाज को कुचलने की कोशिश है। यह घटना 3 फरवरी 2026 को बजट सत्र के दौरान हुई, जब राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरावणे के अप्रकाशित संस्मरणों का हवाला देकर भारत-चीन सीमा विवादों, जैसे गलवान घाटी और डोकलाम पर गंभीर सवाल उठाने की कोशिश की।
वे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सदन में चर्चा चाहते थे, जो राष्ट्रपति के अभिभाषण का अभिन्न हिस्सा है। लेकिन स्पीकर ओम बिरला ने संसदीय नियमों का हवाला देकर उन्हें रोका, क्योंकि स्रोत “अप्रकाशित” था। बीजेपी सांसदों, अमित शाह और राजनाथ सिंह सहित मंत्रियों ने तीखा विरोध किया, जिससे सदन में हंगामा मच गया।
विरोध में कांग्रेस सांसदों ने स्पीकर की ओर कागज उछाले, और परिणामस्वरूप आठ विपक्षी सांसदों (ज्यादातर कांग्रेस के) को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। राहुल गांधी ने सदन के बाहर स्पष्ट कहा कि प्रधानमंत्री मोदी “कॉम्प्रोमाइज्ड” हैं, अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर दबाव में झुक गए हैं, और नरावणे की किताब, एपस्टीन फाइल्स जैसे मुद्दों पर बोलने से डरते हैं।
उन्होंने स्पीकर को पत्र लिखकर कहा कि लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार नेता प्रतिपक्ष को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोका गया—यह लोकतांत्रिक परंपराओं का घोर उल्लंघन है। उन्होंने इसे “लोकतंत्र पर कलंक” बताया और कहा कि सरकार जानबूझकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर उन्हें बोलने से रोक रही है। यह सिर्फ राहुल गांधी का गला घोंटना नहीं है—यह संविधान की आत्मा पर प्रहार है।
राहुल गांधी मोदी सरकार की असफलताओं को बार-बार उजागर करते हैं: रिकॉर्ड बेरोजगारी, जहां युवा सपने टूटते हैं और आत्महत्या की खबरें आम हो गई हैं। देश में बेरोजगारी दर 8% से ऊपर पहुंच चुकी है, और लाखों युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। आसमान छूती महंगाई, जो गरीबों की रोटी-कपड़ा-मकान छीन रही है। पेट्रोल-डीजल से लेकर रसोई गैस तक की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई हैं।
किसानों के साथ विश्वासघात—कृषि कानूनों की वापसी के बाद भी MSP और कर्जमाफी पर खोखले वादे। हजारों किसान सड़कों पर उतर चुके हैं, लेकिन सरकार उनके दर्द को अनसुना कर रही है। अडानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेट घरानों के साथ संदिग्ध सांठगांठ, जहां सार्वजनिक धन निजी जेबों में जाता है।
अडानी घोटाले पर जांच की मांग को दबाया जा रहा है। संस्थाओं का दुरुपयोग—चुनाव आयोग, CBI, ED जैसी एजेंसियां सत्ता के हथियार बन गई हैं, विपक्षी नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है। मोदी सरकार संसद को बहस का मंच नहीं, बल्कि एकतरफा फरमान जारी करने की फैक्ट्री बनाना चाहती है। जहां सवाल पूछना अपराध है, विपक्ष को दुश्मन घोषित किया जाता है, और जनता की आवाज को दबाया जाता है। यह तानाशाही की ओर पहला कदम नहीं—यह उसका खुला प्रदर्शन है।
सदन में लोकतंत्र नहीं बोल रहा—मोदी-शाह की सत्ता-भूख बोल रही है।यह वही सरकार है जिसने देश को रिकॉर्ड असमानता दी, जहां अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब की हालत बदतर। महंगाई से गरीबों की कमर टूट गई, किसानों को सड़कों पर मरने के लिए मजबूर किया गया, संविधान की संस्थाओं को कमजोर किया गया, और अब संसद में विपक्ष की आवाज दबाकर लोकतंत्र को घायल कर रही है।
क्या यह “अमृतकाल” है या “अंधेरकाल”?सोशल मीडिया पर भी इस घटना की गूंज है। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर यूजर्स ने इसे मोदी की असुरक्षा का सबूत बताया, जहां राहुल गांधी को गणतंत्र दिवस पर भी तीसरी पंक्ति में बैठाया गया। एक यूजर ने लिखा कि मोदी इतने असुरक्षित हैं कि गांधी परिवार, जो सत्ता से बाहर है, फिर भी करोड़ों दिलों पर राज करता है।
एक वीडियो में राहुल को फिर से बोलने से रोके जाने की घटना दिखाई गई, जो सरकार की कायरता को उजागर करती है। यदि आज राहुल गांधी जैसा संवैधानिक पदाधिकारी—नेता प्रतिपक्ष—को बोलने नहीं दिया जाता, तो कल आम नागरिक की क्या हालत होगी? संसद में विपक्ष की मौनता लोकतंत्र की मौत की घोषणा होगी।
यह सरकार “सबका साथ, सबका विकास” का नारा देती है, लेकिन व्यवहार में “सबका दमन, सबका नियंत्रण” कर रही है।भारतीय जनता को जागना होगा। क्योंकि यदि हम चुप रहे, तो लोकतंत्र केवल किताबों में, संविधान की प्रस्तावना में सिमट जाएगा—असल जिंदगी में नहीं। राहुल गांधी की आवाज दबाई जा रही है, लेकिन सच्चाई दब नहीं सकती। यह लड़ाई सिर्फ कांग्रेस की नहीं—यह हर उस भारतीय की लड़ाई है जो आजादी, समानता और न्याय चाहता है।लोकतंत्र की रक्षा हर नागरिक का कर्तव्य है। आज खड़े हो जाइए, कल बहुत देर हो जाएगी।
लेखक: विजय शंकर नायक
वरिष्ठ कांग्रेस नेता, झारखंड
