महाशिवरात्रि विशेष लेख :
विजय शंकर नायक,वरिष्ठ कांग्रेस नेता झारखण्ड
महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक क्षण है जब मनुष्य अपने भीतर के विराट से साक्षात्कार करता है। यह वह रात्रि है जब समय ठहर-सा जाता है, जब विचार शांत हो जाते हैं और जब चेतना अपने मूल स्रोत की ओर लौटती है। इस महानिशा में उपासना केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं—भीतर के अंधकार को पहचानकर उसे प्रकाश में बदलने का संकल्प है।
भारतीय अध्यात्म में शिव कोई सीमित देवता नहीं, बल्कि अस्तित्व की वह अवस्था हैं जहाँ सब कुछ विलीन होकर भी पूर्ण रहता है। ‘शिव’ का अर्थ ही है—कल्याण। और ‘रात्रि’ का अर्थ है—अंतर्मुखी होने का अवसर। महाशिवरात्रि इसीलिए आत्मबोध की सबसे अनुकूल घड़ी मानी गई है। रात्रि का रहस्य: अंधकार नहीं, अवकाश- दिन बाहरी गतिविधियों का प्रतीक है; रात्रि आत्मसंवाद का।महाशिवरात्रि हमें सिखाती है कि अंधकार शत्रु नहीं, बल्कि अवसर है—अपने भीतर उतरने का अवसर।

जब संसार सोता है, साधक जागता है। यह जागरण केवल आँखों का नहीं, चेतना का है। इस रात का मौन मन के शोर को शांत करता है। यही कारण है कि ध्यान, जप और मौन इस पर्व के केंद्र में हैं। शिव: विरोधों का अद्वैत- शिव का स्वरूप स्वयं में एक गहन दार्शनिक संदेश है। वे भस्म रमाते हैं, परंतु गंगा को धारण करते हैं। वे नाग को गले में रखते हैं, परंतु करुणा से परिपूर्ण हैं। वे तांडव करते हैं, परंतु समाधि में भी लीन हैं।
उनके शरीर पर भस्म है—यह स्मरण कि सब कुछ नश्वर है। उनके जटाओं में गंगा है—यह संकेत कि जीवन निरंतर बहता है। उनकी तीसरी आँख है—विवेक की ज्वाला। शिव हमें संतुलन सिखाते हैं—वैराग्य और प्रेम का, शक्ति और शांति का। शिवलिंग: अनंत का प्रतीक- लिंग’ का अर्थ है—चिन्ह। शिवलिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है।
यह सृष्टि और चेतना के मिलन का चिह्न है—ऊर्जा और शून्यता का संगम। यह हमें बताता है कि परम सत्य किसी आकृति में सीमित नहीं, वह सर्वव्यापी है। शिवलिंग पर जल अर्पित करना केवल परंपरा नहीं, अपने भीतर की तपिश को शांत करने का प्रतीक है। तांडव: परिवर्तन का नृत्य- अक्सर तांडव को क्रोध का प्रतीक समझा जाता है, परंतु यह सृष्टि के चक्र का संकेत है। जब पुराना ढहता है, तब नया जन्म लेता है। तांडव हमें सिखाता है कि जीवन में परिवर्तन से घबराना नहीं चाहिए। विनाश कभी-कभी विकास की प्रस्तावना होता है। शक्ति का आयाम: शिव और पार्वती-महाशिवरात्रि केवल शिव की उपासना नहीं, बल्कि शक्ति के सम्मान का भी पर्व है।
माता पार्वती का तप, उनका संकल्प, यह बताता है कि आध्यात्मिक उन्नति में स्त्री-शक्ति का योगदान अनिवार्य है। शिव और शक्ति का मिलन यह संदेश देता है कि चेतना और ऊर्जा एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना शक्ति के शिव शून्य हैं, और बिना शिव के शक्ति दिशाहीन।
आदियोगी: योग का उद्गम- शिव को आदियोगी कहा गया है—योग के प्रथम गुरु। योग का अर्थ है—जुड़ना। अपने भीतर के आत्मा से, प्रकृति से, और अंततः परमात्मा से। महाशिवरात्रि की रात ध्यान और मौन का महत्व इसलिए है क्योंकि यह मन की परतों को हटाकर आत्मा की अनुभूति कराती है। सामाजिक समरसता का संदेश – शिव की पूजा में वैभव का प्रदर्शन नहीं—सादगी है। भस्म, बेलपत्र, जल—ये सभी साधारण वस्तुएँ हैं।यह पर्व हमें सिखाता है कि आध्यात्मिकता में भेदभाव का स्थान नहीं। शिव सभी के हैं—धनी के भी, निर्धन के भी; ज्ञानी के भी, अज्ञानी के भी। पर्यावरण और शिव -शिव का स्वरूप प्रकृति से गहराई से जुड़ा है।कैलाश उनका धाम है, गंगा उनकी जटाओं में है, सर्प उनके गले में है। वे ‘पशुपतिनाथ’ हैं—प्रकृति और प्राणियों के संरक्षक।आज जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, महाशिवरात्रि हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने का संदेश देती है। मृत्यु और वैराग्य का बोध- शिव का श्मशानवास हमें जीवन की अस्थिरता का स्मरण कराता है।यह भय नहीं, बल्कि जागरूकता का प्रतीक है। जब हम मृत्यु को स्वीकार करते हैं, तब जीवन का हर क्षण अमूल्य हो जाता है। वैराग्य का अर्थ पलायन नहीं—संतुलित दृष्टि है।
उपवास और साधना का विज्ञान-महाशिवरात्रि में उपवास शरीर और मन की शुद्धि का माध्यम है। जब शरीर हल्का होता है, तो मन अधिक सजग होता है।जागरण हमें अनुशासन सिखाता है—इंद्रियों पर नियंत्रण, विचारों पर संयम। आधुनिक संदर्भ में महाशिवरात्रि-आज का मनुष्य बाहरी उपलब्धियों की दौड़ में भीतर की शांति खो बैठा है।
महाशिवरात्रि हमें विराम लेने का अवसर देती है।यह पर्व सिखाता है—मौन अपनाओ, क्रोध को करुणा में बदलो, शक्ति को संयम में बदलो, और अहंकार को समर्पण में बदलो | आध्यात्मिक मनोविज्ञान-शिव की तीसरी आँख विवेक का प्रतीक है। यह खुलती है, तो अज्ञान भस्म हो जाता है।यह तीसरी आँख हमारे भीतर की जागरूकता है—जो हमें सही निर्णय लेने में सहायता करती है। महाशिवरात्रि: आत्मपरिवर्तन का संकल्प- यह रात्रि केवल जागरण नहीं, जागृति है। यह केवल पूजा नहीं, परिवर्तन है। यह केवल मंत्रोच्चार नहीं, मन की शुद्धि है। जब हम “हर-हर महादेव” कहते हैं, तो उसका अर्थ है—हर हृदय में शिवत्व है।
राजनीति और समाज के लिए संदेश-शिव का नीलकंठ रूप हमें बताता है कि नेता वही है जो समाज के विष को स्वयं में समाहित कर शांति बनाए रखे। तांडव हमें सिखाता है कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होना भी आवश्यक है। शिव संतुलन के प्रतीक हैं—न अति आक्रोश, न अति निष्क्रियता। आध्यात्मिक मनोविज्ञान- शिव की तीसरी आँख ज्ञान का प्रतीक है। जब यह खुलती है, तो अज्ञान जलकर नष्ट हो जाता है। यह तीसरी आँख हमारे भीतर की विवेक दृष्टि है—जो सही और गलत का भेद कराती है। अनछुआ आयाम: श्मशान और वैराग्य-शिव का श्मशानवास हमें मृत्यु की अनिवार्यता का स्मरण कराता है।
यह भय का नहीं, वैराग्य का प्रतीक है। जब हम मृत्यु को स्वीकार करते हैं, तब जीवन का महत्व समझते हैं। निष्कर्ष: शिवत्व की ओर यात्रा- महाशिवरात्रि केवल पूजा और अनुष्ठान का पर्व नहीं—यह आत्मपरिवर्तन का आह्वान है। जब हम शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, तो वह केवल क्रिया नहीं, बल्कि अहंकार का समर्पण है। इस महानिशा पर संकल्प लें—हम अपने भीतर के अंधकार को पहचानेंगे। हम क्रोध को करुणा में बदलेंगे। हम विभाजन को समरसता में बदलेंगे।शिव केवल मंदिरों में नहीं—हमारी चेतना में हैं। जब हम भीतर की शांति को पा लेते हैं, तब ही सच्चा शिवत्व प्रकट होता है।
लेखक :- विजय शंकर नायक , वरिष्ठ कांग्रेस नेता झारखण्ड, ईमेल –vsnayak1966 @gmail.com
