बरेली कॉलेज में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “भारतीय भाषाओं में ज्ञान परंपरा” का गरिमामय समापन, 100 शोधपत्र प्रस्तुत

बरेली, 3 मई 2026 भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) दिल्ली, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास दिल्ली, विश्व हिंदी परिषद दिल्ली एवं हिंदी विभाग, बरेली कॉलेज, बरेली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “भारतीय भाषाओं में ज्ञान परंपरा” का द्वितीय दिवस शनिवार को गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। यह संपूर्ण कार्यक्रम बरेली कॉलेज के प्राचार्य प्रो. ओम प्रकाश राय के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ।


़ संगोष्ठी के द्वितीय दिवस का शुभारंभ माँ शारदे की वंदना एवं दीप प्रज्वलन के साथ मुख्य अतिथि की उपस्थिति में हुआ। प्रो. सुषमा गोंदियाल ने मंचासीन अतिथियों का परिचय एवं स्वागत करते हुए संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की। उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने कहा कि भारतीय भाषाएँ केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान परंपरा की आधारशिला हैं।


रजा राजकीय महाविद्यालय, रामपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अरुण कुमार ने भारतीय भाषाओं को सभ्यताओं से जोड़ते हुए उनके क्रमिक विकास पर प्रकाश डाला। दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. पंकज पटवा ने प्राचीन भारतीय आर्थिक मॉडल को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर आधारित बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के कल्याण हेतु अर्थ का उपार्जन करना था। उन्होंने ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना को आज भी प्रासंगिक बताया। प्रो. डॉ. अवधेश शास्त्री ने जीवन में चार वर्ण एवं चार वेदों के महत्व को रेखांकित किया। अतिथि वक्ता डॉ. अनिल कुमार ‘विश्वकर्मा’ ने भाषा को अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बताते हुए कहा कि भारत पूंजी, सभ्यता एवं संस्कृति में सदैव समृद्ध रहा है।


प्रो. पुरुषोत्तम राव कुंदे ने मराठी संतों की ज्ञान परंपरा के परिप्रेक्ष्य में कहा कि वर्तमान में भाषा के आधार पर अस्मिता संघर्ष की स्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं। बी.एस.ए. कॉलेज, मथुरा के प्रो. शिवराज भारद्वाज ने श्रीमद्भगवद्गीता के आधार पर विकसित भारत एवं पर्यावरणीय संतुलन के संदर्भ में तीन बिंदुओं – कर्म को व्यक्तिगत, भक्ति को समर्पण एवं ज्ञान को आत्मानुकूल बनाने पर बल दिया। डॉ. शिवोम सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता पर विचार रखे। सत्र के अंत में प्रो. निरुपम शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित कर सत्र समापन की घोषणा की।


संगोष्ठी के अंतर्गत ऑनलाइन माध्यम से समानांतर सत्रों का भी आयोजन किया गया, जिसमें देशभर से लगभग 70 शोधार्थियों एवं विद्वानों ने सहभागिता की। कुल मिलाकर ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से लगभग 100 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।


अंतिम सत्र समापन एवं सम्मान समारोह के रूप में आयोजित हुआ, जिसके मुख्य अतिथि विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार रहे। विशिष्ट अतिथियों में विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय संपर्क समन्वयक डॉ. नन्दकिशोर साह, महात्मा ज्योतिबा फुले विश्वविद्यालय की प्रो. बीना रिसीवाल, बरेली के प्रसिद्ध परामर्श चिकित्सक एवं भाषाविद डॉ. शरद अग्रवाल तथा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सह संयोजक संजय स्वामी मंचासीन रहे। वक्ताओं ने हिंदी को विश्व भाषा बनाने एवं इसके संवर्धन के उपायों पर विस्तार से चर्चा की।


इस अवसर पर प्रो. विनय त्रिवेदी को अकादमिक उत्कृष्टता सम्मान, डॉ. अमर ज्योति, डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह व डॉ. शिवोम को शिक्षा गौरव सम्मान तथा डॉ. दुर्गा विजय सिंह एवं डॉ. सौरभ पाल को साहित्य गौरव सम्मान प्रदान किया गया। आकांक्षा (डायट, फरीदपुर, बरेली) को राष्ट्रीय सामाजिक कार्य एवं हिंदी साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। पर्यावरण विज्ञान विभाग की आईटी सेल को उत्कृष्ट तकनीकी सहयोग हेतु सम्मानित किया गया, जिसका सफल संचालन विभाग समन्वयक डॉ. जसपाल सिंह के मार्गदर्शन में हुआ।


संगोष्ठी का सफल संचालन आयोजन सचिव प्रो. मनु प्रताप सिंह एवं संयोजक प्रो. परमजीत कौर के कुशल निर्देशन में संपन्न हुआ। प्रो. मनु प्रताप सिंह के प्रभावी नेतृत्व एवं समन्वय के कारण कार्यक्रम सुव्यवस्थित एवं सफल रहा। समापन सत्र में प्रतिभागियों ने भारतीय भाषाओं एवं ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु निरंतर प्रयास करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद प्रस्ताव प्रो. सुषमा गोंदियाल द्वारा प्रस्तुत किया गया।


कार्यक्रम में डॉ. अजीत कुमार, डॉ. अरविंद कुमार, डॉ. रितेश चौरसिया, प्रो. प्रतिभा, प्रो. संगीता तथा शोधार्थी अंजली, अफरी, मुकेश, मंजीत, हर्षित, अभिषेक एवं प्रदीप का विशेष सहयोग रहा। देशभर से जुड़े विद्वानों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से सक्रिय सहभागिता की।

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