धर्मसिंहवा का बौद्ध स्तूप बदहाल, संरक्षण के बाद अब विकास की दरकार

लालचन्द्र मद्धेशिया
संतकबीरनगर। जनपद के उत्तरी छोर पर स्थित धर्मसिंहवा का प्राचीन बौद्ध स्तूप क्षेत्र की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संरक्षण के बाद स्तूप को भले ही नया स्वरूप मिल गया हो, लेकिन पर्यटन की दृष्टि से इसके विकास की तस्वीर अब भी अधूरी है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में यहां आने वाले पर्यटकों और बौद्ध अनुयायियों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार धर्मसिंहवा का संबंध बौद्ध भिक्षुओं के धर्म प्रचार से रहा है। कभी यहां बौद्ध भिक्षुओं का जमावड़ा लगता था। समीप स्थित सरोवर में स्नान के बाद स्तूप परिसर में धार्मिक चर्चा और प्रार्थना होती थी। समय के साथ देखरेख के अभाव में ऐतिहासिक स्तूप जर्जर होने लगा। कुछ वर्ष पहले तेज आंधी-पानी में इसका एक हिस्सा भी धराशायी हो गया था।
सरकारी पहल से मिली नई जिंदगी
स्तूप के संरक्षण की दिशा में मुख्यमंत्री संवर्धन योजना के तहत पहल की गई। तत्कालीन विधायक राकेश सिंह बघेल की पहल पर पर्यटन विभाग से करीब 50 लाख रुपये की लागत से स्तूप का पुनर्निर्माण और संरक्षण कराया गया। परिसर में चहारदीवारी के साथ मुख्य प्रवेश द्वार भी बनाया गया। इससे वर्षों से उपेक्षित पड़े ऐतिहासिक स्थल को नया स्वरूप मिला, लेकिन इसके बाद पर्यटन सुविधाओं के विकास की गति आगे नहीं बढ़ सकी।
पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होने की अपार संभावनाएं
जानकारों का कहना है कि धर्मसिंहवा स्तूप को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए तो यह पूरे क्षेत्र के विकास का आधार बन सकता है। यहां पर्यटकों के लिए बैठने की व्यवस्था, पेयजल, शौचालय, प्रकाश, सूचना पट्ट और साफ-सफाई जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत है।
स्तूप से प्रसिद्ध बखिरा झील की दूरी करीब 20 किलोमीटर है। ऐसे में दोनों स्थलों को जोड़कर पर्यटन सर्किट विकसित किया जा सकता है। इससे देश के विभिन्न हिस्सों के साथ ही नेपाल, चीन और श्रीलंका जैसे देशों से आने वाले बौद्ध अनुयायियों को भी धर्मसिंहवा तक आकर्षित किया जा सकता है।
विकास से बढ़ेंगे रोजगार के अवसर
स्थल का समुचित विकास होने पर स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। गाइड, दुकान, होटल, होम-स्टे और परिवहन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा मिलने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन यदि ठोस कार्ययोजना बनाकर पर्यटन सुविधाओं का विकास करे तो धर्मसिंहवा को जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल किया जा सकता है।
तालाब पर भी मंडरा रहा अस्तित्व का संकट
स्तूप के समीप स्थित विशाल पोखरा भी बदहाली का शिकार है। अतिक्रमण, जलकुंभी और गंदगी के कारण तालाब का क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है। परिसर में बैठने की पर्याप्त व्यवस्था, प्रकाश और अन्य जरूरी सुविधाएं भी नहीं हैं। शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में बाहर से आने वाले पर्यटकों को परेशानी होती है।
स्थानीय लोगों की मांग है कि ऐतिहासिक स्तूप के संरक्षण के बाद अब इसके आसपास के क्षेत्र का भी कायाकल्प कराया जाए। तालाब की सफाई और सुंदरीकरण के साथ पर्यटकों के लिए जरूरी सुविधाएं विकसित की जाएं, ताकि धर्मसिंहवा की प्राचीन विरासत को पर्यटन से जोड़कर क्षेत्र के विकास और रोजगार को नई गति मिल सके।

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