क्या क्लस्टर योजना से गरीब,दलित-आदिवासी-पिछड़ाअलपसंखयक और ग्रामीण छात्रों की उच्च शिक्षा पर संकट मंडरा रहा है?

लेखक: विजय शंकर नायक
वरिष्ठ नेता, झारखंड कांग्रेस

झारखंड जैसे सामाजिक और आर्थिक रूप से संवेदनशील राज्य में शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि लाखों गरीब और ग्रामीण परिवारों के सपनों का आधार है। गाँवों, कस्बों और दूरदराज़ इलाकों से आने वाले छात्र कठिन परिस्थितियों में रोज कई किलोमीटर की यात्रा कर कॉलेज पहुँचते हैं। कई परिवार खेत मजदूरी, दिहाड़ी और छोटी-मोटी आय से अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। ऐसे समय में रांची विश्वविद्यालय में लागू की जा रही “क्लस्टर योजना” ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकार इस योजना को नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत आधुनिक और संसाधन-साझाकरण वाली व्यवस्था बता रही है। कहा जा रहा है कि इससे कॉलेजों के बीच सहयोग बढ़ेगा और शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी। लेकिन जमीन की सच्चाई इससे अलग दिखाई देती है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह योजना वास्तव में गरीब और ग्रामीण छात्रों की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई गई है?

आज झारखंड के हजारों छात्र ऐसे हैं जो प्रतिदिन 20 से 50 किलोमीटर तक की यात्रा कर कॉलेज पहुँचते हैं। बसों की कमी, खराब सड़कें, महँगा किराया और समय की समस्या पहले से ही उनके सामने बड़ी चुनौती है। क्लस्टर योजना लागू होने के बाद यदि किसी छात्र को एक विषय की पढ़ाई के लिए दूसरे कॉलेज और दूसरे विषय के लिए तीसरे कॉलेज जाना पड़े, तो उसकी स्थिति कितनी कठिन हो जाएगी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

एक गरीब परिवार का छात्र, जो पहले ही सीमित साधनों में पढ़ाई कर रहा है, अतिरिक्त यात्रा खर्च कैसे उठाएगा? जो छात्र सुबह जल्दी घर से निकलकर शाम को लौटते हैं, क्या उनके लिए रोज अलग-अलग कॉलेजों का चक्कर लगाना संभव होगा? यह आशंका वास्तविक है कि बड़ी संख्या में आर्थिक रूप से कमजोर छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं।

ग्रामीण छात्राओं की स्थिति और भी चिंताजनक हो सकती है। दूर-दराज़ क्षेत्रों में सुरक्षित और नियमित परिवहन की कमी पहले से एक गंभीर समस्या है। यदि उन्हें दूसरे कॉलेजों में जाना पड़ा, तो अभिभावकों की चिंता बढ़ेगी और कई परिवार बेटियों की पढ़ाई रोकने का निर्णय ले सकते हैं। यह सामाजिक दृष्टि से भी एक बड़ा नुकसान होगा।

इस योजना के समर्थक कहते हैं कि कॉलेज संसाधन साझा करेंगे, लेकिन सवाल यह है कि क्या झारखंड के अधिकांश कॉलेज इसके लिए तैयार हैं? क्या सभी कॉलेजों में पर्याप्त डिजिटल व्यवस्था, प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय और परिवहन सुविधाएँ उपलब्ध हैं? वास्तविकता यह है कि आज भी कई कॉलेज बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं।

देश के अन्य राज्यों के अनुभव भी उत्साहजनक नहीं रहे हैं। ओडिशा में लागू खल्लीकोट क्लस्टर यूनिवर्सिटी मॉडल प्रशासनिक भ्रम, संसाधनों की कमी और समन्वय विफलता के कारण अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका। महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी क्लस्टर यूनिवर्सिटी की कई योजनाएँ अधूरी रहीं या व्यवहारिक कठिनाइयों में फँस गईं। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि केवल कागजों पर बनाई गई योजना जमीनी हकीकत में सफल नहीं होती।

झारखंड की परिस्थितियाँ और भी चुनौतीपूर्ण हैं। यहाँ बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। आर्थिक असमानता अधिक है। परिवहन और डिजिटल ढाँचा अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है। ऐसे राज्य में बिना व्यापक तैयारी और संवाद के क्लस्टर योजना लागू करना शिक्षा व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डाल सकता है।

शिक्षा नीति का उद्देश्य छात्रों को सुविधा देना होना चाहिए, न कि नई कठिनाइयाँ पैदा करना। यदि कोई योजना गरीब और ग्रामीण छात्रों की पहुँच को कम करती है, उनका खर्च बढ़ाती है और उन्हें मानसिक तथा आर्थिक दबाव में डालती है, तो उस पर गंभीर पुनर्विचार आवश्यक है।

सरकार को चाहिए कि वह इस योजना को लागू करने से पहले छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों से व्यापक चर्चा करे। विशेष रूप से ग्रामीण और गरीब छात्रों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। क्योंकि उच्च शिक्षा पर पहला अधिकार उन्हीं युवाओं का है जो संघर्ष के बीच अपने सपनों को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

यदि शिक्षा व्यवस्था ऐसी बन जाए जिसमें केवल आर्थिक रूप से सक्षम छात्र ही टिक सकें, तो यह सामाजिक न्याय और समान अवसर की भावना के विरुद्ध होगा। झारखंड को ऐसी शिक्षा नीति चाहिए जो गाँव के गरीब छात्र को आगे बढ़ाए, न कि उसे कॉलेज के दरवाज़े से वापस लौटने पर मजबूर करे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *