सत्ता–कॉर्पोरेट गठजोड़ का कड़वा सचजंगलों की कीमत पर विकास, आदिवासी बेघर, जंगल लापता और खतरे में भारत का भविष्य -विजय शंकर नायक,

भारत सदियों से प्रकृति और मानव के संतुलन का प्रतीक रहा है। यहाँ जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व का आधार हैं। आदिवासी समुदायों के लिए जंगल उनकी पहचान हैं; नदियाँ, पहाड़ और वन उनके पूर्वजों की स्मृतियाँ हैं। लेकिन आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ “विकास” का नारा सबसे शक्तिशाली बना दिया गया है—और इसी के नाम पर जंगलों, नदियों और समुदायों को बलि चढ़ाया जा रहा है।


*भाजपा सरकार के दौर में विकास का मॉडल तेजी से “सत्ता–कॉर्पोरेट गठजोड़” में बदलता दिख रहा है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों को बड़े उद्योगों के लिए खोल दिया गया है और चारो तरफ विकास के नाम पर वनों की अन्धाधुन कटाई की जा रही है और मानव जाति तथा देश का भविष्य खतरे में है *।

विकास या विनाश? आंकड़े खुद गवाही देते हैं


पिछले एक दशक (2014–2023) में:- 1.5 लाख हेक्टेयर से अधिक वन भूमि डायवर्ट , अनुमानित 2–3 करोड़ पेड़ काटे गए , सबसे ज्यादा हिस्सा कोयला खनन, हाईवे, रेलवे और औद्योगिक प्रोजेक्ट्स में गया, यह केवल आंकड़े नहीं—यह भारत के पर्यावरण, वन्यजीव और आदिवासी समाज के विनाश की कहानी है। सरकार दावा करती है कि “Forest Cover” बढ़ रहा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार:- प्राकृतिक घने जंगल घट रहे हैं, उनकी जगह प्लांटेशन लगाए जा रहे हैं
जैव विविधता खत्म हो रही है | यानी कागज पर हरियाली, जमीन पर बर्बादी।

प्रोजेक्ट–वार जंगलों का विनाश: सच्चाई सामने

  1. ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट :-
    130–166 वर्ग किमी (13,000–16,000 हेक्टेयर) जंगल प्रभावित | 50–60 लाख पेड़ों की कटाई का अनुमान | यह क्षेत्र जैव विविधता का हॉटस्पॉट है—फिर भी इसे मेगा पोर्ट, एयरपोर्ट और टाउनशिप के लिए साफ किया जा रहा है। एक ही प्रोजेक्ट में इतने बड़े जंगल का खत्म होना अभूतपूर्व है।
  2. हसदेव अरण्य (छत्तीसगढ़) :-
    10,000+ हेक्टेयर जंगल सीधे प्रभावित, 5–7 लाख पेड़ों की कटाई का अनुमान,यह क्षेत्र हाथी कॉरिडोर और आदिवासी जीवन का केंद्र है। फिर भी कोयला खनन के लिए इसे खोल दियागया—
    क्या यह विकास है या जंगलों की बलि?
  3. चारधाम हाईवे प्रोजेक्ट (उत्तराखंड) :-

  4. 900 किमी सड़क विस्तार , 50,000–70,000 पेड़ों की कटाई हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भारी कटाई और खुदाई के कारण:- भूस्खलन बढ़े, पर्यावरणीय अस्थिरता बढ़ी आस्था के नाम पर पर्यावरण से खिलवाड़।
  5. अरावली पर्वतमाला

  6. 30–40% हरित आवरण में गिरावट (दीर्घकालिक), लाखों पेड़ अवैध खनन में खत्म, यह क्षेत्र उत्तर भारत की जलवायु सुरक्षा का आधार है। फिर भी सरकार की निष्क्रियता ने इसे खत्म होने दिया।
  7. पूर्वोत्तर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स

  8. 10,000+ हेक्टेयर जंगल प्रभावित, लाखों पेड़ों की कटाई,ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के प्रवाह पर असर पड़ा है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का खामियाजा आने वाली पीढ़ियाँ भुगतेंगी।
  9. पश्चिमी घाट (गोवा–कर्नाटक)
    1,000–2,000 हेक्टेयर जंगल प्रभावित, 1–2 लाख पेड़ों की कटाई, यह क्षेत्र विश्व धरोहर है—फिर भी खनन और रेलवे के लिए खतरे में है।
    कॉमन पैटर्न: हर जगह एक ही खेल
    हर प्रोजेक्ट में एक ही कहानी दिखती है:-जंगल → कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट → सरकारी मंजूरी → विरोध → दमन → विनाश, यह संयोग नहीं—यह एक सुनियोजित पैटर्न है जो हमे एक सुनियोजित षडयंत्र और सोची समझी साजिश की और इशारा करती है |

  10. आदिवासी मूलनिवासी : सबसे बड़े पीड़ित
    आदिवासी आबादी: 8.6% मूलनिवासी आबादी 60% लेकिन विस्थापन मेंआदिवासी का हिस्सा: 40%+ मूलनिवासी का हिस्सा 30%, जंगल कटते हैं तो:- जमीन जाती है, रोजगार खत्म होता है, सभ्यताएं और संस्कृति मिटती है| विस्थापन के बाद उन्हें मिलता है—न घर, न काम, न सम्मान | यह विकास नहीं—यह सरसार घोर अन्याय है।
    भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप
    पर्यावरण कानून कमजोर किए गए, जनसुनवाई प्रक्रिया सीमित की गई, कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दी गई | “Ease of Doing Business” को “Ease of Destroying Forests” बना दिया गया है।
    वन्यजीव और पर्यावरण संकट
    हाथी कॉरिडोर टूटे, बाघों का आवास सिकुड़ा, मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा , जब जानवर शहरों में आते हैं, तो दोष उनका नहीं— दोष उस सिस्टम का है जिसने उनका घर छीन लिया।
    भविष्य: एक डरावनी चेतावनी

  11. कांग्रेस का दृष्टिकोण: संतुलित विकास

  12. अगर यही मॉडल जारी रहा:- जल संकट बढ़ेगा,तापमान बढ़ेगा, बाढ़ और सूखा सामान्य होंगे | आज का विकास, कल की तबाही बन सकता है।

  13. कांग्रेस का मानना है:- विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति और लोगों की कीमत पर नहीं,समाधान:- पारदर्शी पर्यावरण मंजूरी ग्राम सभा की सहमति,आदिवासी मूलनिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा,हरित क्रांति और टिकाऊ विकास
    अब फैसला जनता को करना है
    भारत आज दो रास्तों पर खड़ा है:- कॉर्पोरेट मुनाफा + जंगलों का विनाश, संतुलित विकास + पर्यावरण संरक्षण
    अंतिम सवाल
    क्या भारत का भविष्य कुछ कॉर्पोरेट घरानों के लिए है? या 140 करोड़ जनता के लिए?
    अंतिम चेतावनी
    पिछले 10 वर्षों में 1.5 लाख हेक्टेयर जंगल और करोड़ों पेड़ों की बलि देकर जो विकास खड़ा किया जा रहा है—वह भारत का भविष्य नहीं, बल्कि उसकी बर्बादी की नींव है
    यह लड़ाई सिर्फ जंगलों की नहीं—भारत के अस्तित्व की लड़ाई है

  14. लेखक: विजय शंकर नायक, वरिष्ठ नेता, झारखण्ड कांग्रेस

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