परीक्षा व्यवस्था का संकट और युवाओं का टूटता भरोसा

— विजय शंकर नायक
प्रदेश प्रवक्ता, झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी

भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यही युवा देश की सबसे बड़ी शक्ति भी है और भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद भी। लेकिन जब यही युवा वर्षों की मेहनत के बाद भी निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं कर पाता, तब यह केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का भी प्रश्न बन जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और अनियमितताओं की घटनाओं ने युवाओं के मन में गहरी निराशा पैदा की है। लाखों छात्र-छात्राएं वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च कर बच्चों को कोचिंग दिलाते हैं, लेकिन परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र लीक होने या परीक्षा रद्द होने की खबरें उनकी मेहनत पर पानी फेर देती हैं।

सरकार ने इन घटनाओं पर कार्रवाई की बात कही है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि यह कार्रवाई पर्याप्त नहीं है और बड़े नेटवर्क तक जांच नहीं पहुंचती। ऐसे मामलों ने परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यदि प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।

आज देश पहले से ही बेरोजगारी की चुनौती का सामना कर रहा है। लाखों सरकारी पद रिक्त हैं, कई भर्तियां वर्षों तक अधर में लटकी रहती हैं और अदालतों में उलझ जाती हैं। ऐसे माहौल में परीक्षा घोटालों की घटनाएं युवाओं की चिंता को और बढ़ा देती हैं।

कांग्रेस का मानना है कि शिक्षा केवल सेवा नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। शिक्षा का अधिकार कानून, सर्व शिक्षा अभियान और उच्च शिक्षा संस्थानों के विस्तार जैसे कदम इसी सोच के तहत उठाए गए थे। पार्टी का दावा है कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सार्वजनिक निवेश बढ़ाना, सरकारी संस्थानों को सशक्त करना और भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाना आवश्यक है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कई सकारात्मक प्रावधान हैं, लेकिन किसी भी नीति की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। यदि सरकारी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और भर्ती एजेंसियों को पर्याप्त संसाधन और जवाबदेह व्यवस्था नहीं मिलेगी, तो अपेक्षित परिणाम हासिल करना कठिन होगा।

समय की मांग है कि पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर कठोर कार्रवाई हो, परीक्षा सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीकी तंत्र विकसित किया जाए, दोषियों को सख्त सजा मिले और युवाओं का भरोसा दोबारा कायम किया जाए। साथ ही शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाने और रिक्त सरकारी पदों पर समयबद्ध नियुक्तियां सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

देश का युवा किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहा। उसकी अपेक्षा केवल इतनी है कि उसकी मेहनत का सम्मान हो, उसे निष्पक्ष अवसर मिले और उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो। शिक्षा और रोजगार का प्रश्न किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का विषय है। यदि युवा व्यवस्था पर विश्वास खो देगा, तो इसका असर केवल रोजगार पर नहीं, बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति पर भी पड़ेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को राजनीतिक विवादों से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। क्योंकि एक मजबूत भारत की नींव केवल मजबूत अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय शिक्षा व्यवस्था और अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त युवाओं से तैयार होती है।

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