पत्रकारों के अधिकारों के अग्रिम प्रहरी: शाहनवाज हसन और न्याय की अनवरत जंग

संजय पांडेय
भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ (बीएसपीएस) महज अक्षरों से बना कोई नाम या औपचारिक संस्था नहीं है, बल्कि यह देश भर के कलमकारों की उस बिखरी हुई चीख का संबल है, जिसे अक्सर सत्ता, समाज और व्यवस्था अनदेखा कर देती है. प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के गलियारों में रात-दिन अपनी जान हथेली पर रखकर सच को तराशने वाले श्रमजीवी पत्रकारों के अधिकारों, उनके स्वाभिमान और उनके अस्तित्व की ढाल बनकर यह संगठन आज पूरे देश में खड़ा है. भारत के 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैले लगभग 22,000 पत्रकारों की धड़कन बना यह विशाल परिवार इस बात का जीता-जागता सबूत है कि जब सत्य के सिपाही एक जुट होते हैं, तो अन्याय की सबसे मजबूत दीवारें भी थरथरा उठती हैं.

इस पावन और महान अभियान की नींव 1 मई 2017 को कन्याकुमारी की उस ऐतिहासिक और दूरदर्शी धरती पर रखी गयी थी, जब शाहनवाज हसन जी के संवेदनशील दिल ने पत्रकारों की पीड़ा को महसूस किया. यह वही शाहनवाज जी हैं, जिन्होंने इससे पूर्व ‘झारखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन’ की स्थापना कर झारखंड की माटी के पत्रकारों को पहचान दी और ‘आइएफडब्ल्यूजे’ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ी. जब-जब किसी बेबस पत्रकार पर ज़ुल्म का पहाड़ टूटा, जब-जब किसी कलम को खामोश करने की घिनौनी साजिश हुई, तब-तब शाहनवाज जी बिना अपनी परवाह किये, एक रक्षक और शक्तिमान की भांति तुरंत मौके पर पहुंचे.

उनकी जीवन-शैली किसी तपस्या से कम नहीं है. अपने लोकप्रिय समाचार पत्र ‘बिरसा वाणी’ की अनगिनत व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों के बीच से समय निचोड़कर वे देश के किसी भी सुदूर कोने में पीड़ित पत्रकार का आंसू पोंछने निकल पड़ते हैं. अब तक पत्रकार उत्पीड़न और हत्या के 170 से भी अधिक संगीन मामलों में उनका कानूनी और व्यावहारिक हस्तक्षेप केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि न्याय पाने की एक पवित्र जंग रहा है, जिसमें उन्होंने हर पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाकर ही दम लिया.

उनकी संवेदनशीलता की सीमाएं देश के भूगोल तक सीमित नहीं हैं. जब विदेशों में भी किसी पत्रकार पर अत्याचार होता है, तो उनकी बुलंद आवाज और त्वरित बयान दुनिया को यह अहसास कराता है कि पत्रकार अकेले नहीं हैं. शाहनवाज जी का निष्काम समर्पण और अदम्य साहस इस बात का स्पष्ट इशारा कर रहा है कि वह दिन अब दूर नहीं जब वे वैश्विक पटल पर भी दुनिया भर के पत्रकारों के अधिकारों के अमर प्रहरी बनकर खड़े होंगे. ऐसे निस्वार्थ योद्धा और इस महान संगठन के चरणों में हर उस इंसान का मस्तक स्वतः ही श्रद्धा से झुक जाता है, जो सच की कीमत और कलम की गरिमा को समझता है.

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