डॉ. शीला शर्मा
व्याख्याता, संस्कृत
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
गर्मी की लंबी छुट्टियों के बाद एक बार फिर विद्यालयों के द्वार खुलने जा रहे हैं। बच्चों के चेहरों पर नए सत्र की उत्सुकता झलक रही है। नए बैग, नई किताबें, नई कक्षा और नए सपनों के साथ वे विद्यालय पहुंचेंगे। अभिभावकों की भी अनेक अपेक्षाएँ होंगी कि उनका बच्चा इस वर्ष कुछ नया सीखेगा और अपने भविष्य की ओर एक और कदम आगे बढ़ाएगा। प्रशासन भी शिक्षकों के लिए विभिन्न योजनाएँ, निर्देश और दायित्व निर्धारित कर चुका है। ऐसे में शिक्षा का वातावरण पुनः जीवंत होने लगेगा।

किन्तु इस उत्साह के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था वास्तव में बच्चों के समग्र विकास में सहायक सिद्ध हो रही है? क्या हम ऐसे विद्यार्थियों का निर्माण कर पा रहे हैं जिनमें ज्ञान के साथ-साथ नैतिकता, संस्कार, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व भी हो?
शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करना या रोजगार हासिल करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य एक अच्छे इंसान और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण है। ऐसा नागरिक जो अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझे तथा उन्हें निभाने के लिए प्रतिबद्ध हो। दुर्भाग्यवश वर्तमान व्यवस्था में नैतिक शिक्षा और जीवन मूल्यों की चर्चा तो होती है, लेकिन उनके व्यावहारिक विकास के लिए पर्याप्त समय और अनुकूल वातावरण नहीं मिल पाता।
इस स्थिति के लिए केवल विद्यालय या शिक्षक जिम्मेदार नहीं हैं। आज शिक्षक अनेक प्रशासनिक कार्यों, सर्वेक्षणों, ऑनलाइन रिपोर्टिंग, पोर्टल अपडेट, विभागीय बैठकों और विभिन्न गैर-शैक्षणिक दायित्वों में व्यस्त रहते हैं। परिणामस्वरूप उनका बहुमूल्य समय, जो विद्यार्थियों के शिक्षण और व्यक्तित्व निर्माण में लगना चाहिए, अन्य कार्यों में व्यतीत हो जाता है।
जब शिक्षक स्वयं प्रशासनिक दबाव और अतिरिक्त कार्यभार से तनावग्रस्त रहेगा, तब वह विद्यार्थियों को कितना समय और ऊर्जा दे पाएगा? बच्चों की व्यक्तिगत समस्याओं को समझना, उनकी प्रतिभा को पहचानना, उनमें नैतिक मूल्यों का विकास करना और उन्हें जीवनोपयोगी शिक्षा प्रदान करना तभी संभव है जब शिक्षक को उसके मूल कार्य—शिक्षण—पर केंद्रित रहने का अवसर मिले।
राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों और घोषणाओं से नहीं होता। उसका वास्तविक आधार कक्षा में बैठा वह विद्यार्थी होता है जो भविष्य में देश का नागरिक, वैज्ञानिक, शिक्षक, चिकित्सक, प्रशासक या जनप्रतिनिधि बनेगा। यदि हम वास्तव में एक सशक्त, संस्कारित और नैतिक समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो शिक्षा व्यवस्था को केवल परिणामों और आंकड़ों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। शिक्षकों पर अनावश्यक प्रशासनिक बोझ कम करना होगा और विद्यालयों को ऐसा वातावरण देना होगा जहाँ शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहकर जीवन मूल्यों का भी विकास करे।
नए शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ पर हमें स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए कि क्या हम केवल कक्षाएँ प्रारंभ कर रहे हैं, या वास्तव में ऐसी शिक्षा की शुरुआत कर रहे हैं जो बच्चों को बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनाए?
विद्यालयों के द्वार तो हर वर्ष खुलते हैं, आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य के द्वार भी खुलें। तभी हम आने वाली पीढ़ी को वह भविष्य दे सकेंगे जिसकी कल्पना एक विकसित, शिक्षित और संस्कारित राष्ट्र के लिए की जाती है।
