जल संकट और बदलते मौसम पर गंभीर चेतावनी: पर्यावरण पत्रकार विवेक मिश्रा को राष्ट्रीय ‘जल प्रहरी’ सम्मान

बहराइच। पर्यावरण और जल संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले वरिष्ठ पर्यावरण पत्रकार विवेक मिश्रा को हाल ही में नागपुर में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा राष्ट्रीय “जल प्रहरी” सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान देशभर में जल संरक्षण, नदियों और पर्यावरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली चुनिंदा हस्तियों को प्रदान किया गया।

विवेक मिश्रा लंबे समय से पर्यावरण पत्रकारिता और जल संकट से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय हैं। वे देश की प्रतिष्ठित पर्यावरण पत्रिका “डाउन टू अर्थ” और “सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट” से जुड़े रहे हैं। उनकी रिपोर्टिंग खासतौर पर उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र, नदियों, भूजल संकट, जलवायु परिवर्तन, किसानों की समस्याओं और पर्यावरणीय असंतुलन जैसे विषयों पर केंद्रित रही है।

उन्होंने घाघरा नदी, तराई क्षेत्र की छोटी नदियों, पारंपरिक जल स्रोतों और बदलते मौसम पर कई महत्वपूर्ण शोध आधारित रिपोर्टें और लेख लिखे हैं। उनके इन्हीं कार्यों के लिए उन्हें पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। उस दौरान उनकी शोध पुस्तक का विमोचन भी किया गया था।

बहराइच लौटने पर विवेक मिश्रा ने लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आज दुनिया “लोकल टू ग्लोबल” से आगे बढ़कर “ग्लोबल टू लोकल” के दौर में पहुंच चुकी है। वैश्विक तापवृद्धि का प्रभाव अब गांवों, खेतों और स्थानीय जल स्रोतों पर सीधे दिखाई दे रहा है। इसका सबसे बड़ा असर मेहनतकश जनता, किसान और मजदूर वर्ग पर पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि बढ़ती गर्मी और गहराता जल संकट एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर के एक शोध का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि गंगा नदी में पिछले 1350 वर्षों का सबसे भीषण सूखा देखा जा रहा है। इसके साथ ही गंगा के मैदानी क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा लगातार घट रही है।

विवेक मिश्रा ने कहा कि एल नीनो और ला नीना जैसी मौसमी गतिविधियां तेजी से भारत के मानसून को प्रभावित कर रही हैं। मानसून, जिसे भारत का “वित्त मंत्री” कहा जाता है, अब असंतुलित होता जा रहा है। इसका सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ रहा है और किसानों की लागत तक निकलना मुश्किल हो गया है।

उन्होंने कहा कि पर्यावरण संकट का वास्तविक समाधान स्थानीय स्तर पर जल और हरित वातावरण को मजबूत बनाने में है। यदि गांव, कस्बे और शहर अपने आसपास के तालाब, कुएं, नदियां और वर्षा जल संरक्षण की व्यवस्थाएं पुनर्जीवित करें, तो बड़े जलवायु संकटों के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

बहराइच की स्थिति पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि यहां वर्षा जल को छोटी मौसमी नदियों से जोड़ने वाली प्राकृतिक नालियां तेजी से नष्ट हो चुकी हैं। छोटी और सहायक नदियां सीवेज तथा औद्योगिक प्रदूषण से प्रभावित हैं और उनमें पर्यावरणीय बहाव लगभग समाप्त हो चुका है।

उन्होंने चेतावनी दी कि नदियों में तेजी से “ऑक्सीजन की कमी” हो रही है, यानी जल में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। ऐसी स्थिति में नदियां धीरे-धीरे मृतप्राय बनती जा रही हैं।

विवेक मिश्रा ने कहा कि समाज का नदियों, तालाबों और कुओं से सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ता भी टूटता जा रहा है। वर्षा जल संरक्षण की उपेक्षा कर केवल भूजल पर निर्भरता आने वाले समय में समाज को जल संकट की ओर धकेल सकती है, जिसका खामियाजा अगली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ता तापमान केवल पेड़-पौधों की कमी का संकेत नहीं है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि हमारे जल स्रोत बेहद खराब स्थिति में पहुंच चुके हैं।

नागपुर में आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मान समारोह में देशभर की 40 जल योद्धा हस्तियों को सम्मानित किया गया। इनमें उमा शंकर पांडेय, अनिल जोशी तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के जल विशेषज्ञ भी शामिल रहे।

कार्यक्रम में प्रसिद्ध अभिनेता नाना पाटेकर की मौजूदगी विशेष आकर्षण का केंद्र रही।

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