एक पल की निराशा, अपनों के लिए जिंदगी भर का दर्द

नई पीढ़ी से मेरी एक भावुक अपील—मुश्किल कितनी भी बड़ी हो, जिंदगी से बड़ी नहीं होती

लेखक: विजय शंकर नायक
प्रदेश प्रवक्ता, झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी

आज जब हम आधुनिकता, तकनीक और विकास की तेज रफ्तार के दौर से गुजर रहे हैं, तब हमारे सामने एक ऐसी चिंता भी खड़ी हो रही है, जिस पर समाज को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। हमारी नई पीढ़ी प्रतिभाशाली है, महत्वाकांक्षी है, सपनों से भरी है और जीवन में आगे बढ़ना चाहती है। लेकिन कई बार छोटी-सी असफलता, रिश्ते में आई दरार, परीक्षा में कम अंक, नौकरी न मिलना, आर्थिक परेशानी या परिवार से किसी विवाद के बाद कुछ युवा इतने निराश हो जाते हैं कि अपनी जिंदगी समाप्त करने जैसा कदम उठा लेते हैं।

ऐसी खबर जब सामने आती है, तो मैं केवल उस युवा के बारे में नहीं सोचता, बल्कि उसके पीछे छूट गए पूरे परिवार की जिंदगी के बारे में सोचता हूं।

जरा कल्पना कीजिए उस मां की, जिसने अपने बच्चे को नौ महीने अपनी कोख में रखा। उसके जन्म पर खुशियां मनाईं। उसकी हर छोटी उपलब्धि पर गर्व किया। बीमारी में रात-रात भर जागी। उसके भविष्य के लिए अपने हिस्से की खुशियां तक छोड़ दीं। वही मां जब एक दिन अपने बच्चे की तस्वीर के सामने बैठती होगी, तो उसके पास शायद शब्द नहीं बचते होंगे।
एक पिता, जिसने अपनी जिंदगी की मेहनत अपने बच्चे के भविष्य के नाम कर दी, शायद मन ही मन खुद से पूछता होगा “मैं अपने बच्चे के दर्द को समझ क्यों नहीं पाया? उसने मुझसे एक बार कहा क्यों नहीं?
यही वह पीड़ा है, जिसे हमें समझना होगा।
जिस समस्या से बचने के लिए कोई युवा जिंदगी खत्म करता है, वह समस्या उसके साथ खत्म नहीं होती। वह उसके परिवार के जीवन में एक गहरे घाव की तरह रह जाती है। घर वही रहता है, कमरे वही रहते हैं, सामान वही रहता है, लेकिन उस घर की हंसी कहीं खो जाती है।
बच्चे के कपड़े देखकर मां की आंखें भर आती हैं। उसकी किताबें देखकर पिता कुछ पल के लिए ठहर जाता है। मोबाइल में पुरानी तस्वीर सामने आती है तो परिवार का हर सदस्य भीतर से टूट जाता है। जन्मदिन आता है तो घर में उत्सव की जगह सन्नाटा होता है। त्योहार आते हैं, लेकिन खुशियां अधूरी लगती हैं।और सबसे कठिन सवाल यह होता है—**“काश, उसने हमसे बात कर ली होती।”**
मेरे प्यारे युवा साथियों, मैं आपसे यह बात किसी उपदेश के रूप में नहीं कह रहा हूं। मैं आपसे एक बड़े भाई, एक पिता और समाज के एक जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में कहना चाहता हूं कि **जिंदगी में कोई भी परेशानी आपकी जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती।**आज परीक्षा में कम अंक आए हैं, तो कल फिर परीक्षा होगी। आज नौकरी नहीं मिली है, तो कल दूसरा अवसर आएगा। आज व्यापार में नुकसान हुआ है, तो कल फिर शुरुआत की जा सकती है। आज कोई रिश्ता टूट गया है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि आपकी पूरी जिंदगी टूट गई।
*एक परीक्षा आपकी योग्यता का अंतिम प्रमाण नहीं है*।
*एक असफलता आपकी पहचान नहीं है*।
*एक रिश्ता आपकी पूरी जिंदगी नहीं है*।
*एक बुरा समय आपका पूरा भविष्य नहीं है*।
जिंदगी का सबसे खूबसूरत सच यही है कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं।जो दर्द आज असहनीय लगता है, वह कुछ समय बाद स्मृति बन सकता है। जो रास्ता आज बंद दिखाई देता है, उसके सामने कल कई नए रास्ते खुल सकते हैं। लेकिन उन रास्तों को देखने के लिए सबसे जरूरी है—**आपका जीवित रहना।**
इसलिए जब कभी मन में बहुत ज्यादा बेचैनी हो, जब लगे कि कोई आपको समझ नहीं रहा, जब लगे कि सारी दुनिया आपके खिलाफ है, उस समय अकेले मत रहिए।
अपनी मां से बात कीजिए। पिता से बात कीजिए। भाई-बहन से बात कीजिए। किसी दोस्त से बात कीजिए। किसी शिक्षक या भरोसेमंद व्यक्ति से बात कीजिए। आवश्यकता हो तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लीजिए।

मदद मांगना कमजोरी नहीं है। अपनी परेशानी स्वीकार करना कमजोरी नहीं है। रो पड़ना कमजोरी नहीं है। बल्कि अपने दर्द को पहचानकर सहायता लेना साहस की निशानी है।

मैं नई पीढ़ी के माता-पिता से भी एक बात कहना चाहता हूं। अपने बच्चों से केवल यह मत पूछिए कि—“पढ़ाई कैसी चल रही है?” “नंबर कितने आए?” “नौकरी कब मिलेगी?
कभी उनके पास बैठकर यह भी पूछिए—तुम अंदर से कैसे हो?”
“कोई परेशानी तो नहीं है?”
“क्या तुम्हें किसी बात की चिंता है

कई बार बच्चों को समाधान से पहले सिर्फ किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है, जो उन्हें बिना डांटे और बिना जज किए सुन सके और युवाओं से मेरी विशेष अपील है—अपने मन की बात दबाकर मत रखिए। दुनिया के सामने मजबूत दिखने की कोशिश में अपने भीतर के दर्द को अकेला मत छोड़िए।
अगर कभी मन में बहुत नकारात्मक विचार आएं, तो उस समय कोई अंतिम निर्णय मत लीजिए। **उस क्षण किसी व्यक्ति तक पहुंचिए। बातचीत कीजिए। मदद मांगिए। अपने आपको समय दीजिए।**
क्योंकि जिंदगी में कई फैसले बाद में बदले जा सकते हैं, लेकिन जिंदगी का अंत वापस नहीं लिया जा सकता।

मैं चाहता हूं कि हमारी नई पीढ़ी असफलता से डरे नहीं, बल्कि उससे सीखे। गिरने से घबराए नहीं, बल्कि गिरकर उठना सीखे। दूसरों की सफलता से अपनी तुलना करने के बजाय अपनी यात्रा पर विश्वास करे।
सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली चमक-दमक को पूरी जिंदगी का सच न समझें। हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे संघर्ष हो सकता है। हर सफल व्यक्ति ने कभी न कभी असफलता देखी है।
*इसलिए खुद को किसी दूसरे की जिंदगी से मत तौलिये। अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने की कोशिश कीजिए।**

मेरे युवा साथियों, मैं आपसे हाथ जोड़कर केवल एक बात कहना चाहता हूं— *जब जिंदगी आपको तोड़ने लगे, तब जिंदगी को खत्म मत कीजिए; अपने आपको संभालने के लिए किसी का हाथ पकड़ लीजिए।**
जब लगे कि कोई रास्ता नहीं है, तो किसी से पूछिए। जब लगे कि आप अकेले हैं, तो किसी के पास जाइए। जब लगे कि सब खत्म हो गया है, तो अपने आप से कहिए—
*नहीं, मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है* हो सकता है आज आपकी जिंदगी का अध्याय बहुत कठिन हो। लेकिन कौन जानता है, आने वाला अध्याय आपकी जिंदगी का सबसे सुंदर अध्याय बन जाए।
आपके माता-पिता ने आपको केवल जन्म नहीं दिया है; उन्होंने आपके भीतर अपना भविष्य देखा है। आपके सपनों में उनके सपने जुड़े हैं। इसलिए अपने जीवन को एक क्षण की निराशा के हवाले मत कीजिए।
*जिंदगी अनमोल है*।
आप अनमोल हैं।
आपके सपने अनमोल हैं।**
मुश्किल समय आए तो रुकिए, संभलिए, रोइए, किसी से बात कीजिए, मदद लीजिए—लेकिन **अपनी जिंदगी से हार मत मानिए।**

क्योंकि—
एक पल की निराशा गुजर सकती है,लेकिन जिंदगी खत्म करने का फैसला अपनों के लिए जिंदगी भर का दर्द बन सकता है।

विजय शंकर नायक
प्रदेश प्रवक्ता, झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी

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