मोइरंग दिवस: आजाद हिंद फौज के शौर्य, त्याग और राष्ट्रगौरव की अमर गाथा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक ऐसे स्वर्णिम पृष्ठ हैं, जो साहस, बलिदान और राष्ट्रप्रेम की असाधारण गाथाओं से भरे पड़े हैं।

इन्हीं गौरवशाली अध्यायों में से एक है — १४ अप्रैल १९४४ का मोइरंग दिवस। यह वह ऐतिहासिक तिथि है जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज ने भारत की पवित्र भूमि पर अपना विजय-पताका फहराया था। भले ही यह भूमि मणिपुर के मोइरंग नामक छोटे से नगर की थी, परंतु इस घटना का प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक महत्त्व अतुलनीय है। यह केवल एक सैन्य अभियान की सफलता नहीं थी, यह करोड़ों भारतीयों के स्वाभिमान, स्वतंत्रता की अदम्य ललक और राष्ट्रगौरव का जीवंत उद्घोष था।

आजाद हिंद फौज का गठन मूलतः कैप्टन मोहन सिंह ने १९४२ में मलाया और सिंगापुर में बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों से किया था। परंतु इस संगठन को वास्तविक दिशा, दृष्टि और प्रेरणा मिली नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में। जुलाई १९४३ में नेताजी ने INA की कमान संभाली और सिंगापुर के कैथी थिएटर से उनका वह ओजस्वी उद्घोष — “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा” — पूरे एशिया में गूँज उठा।नेताजी ने अक्टूबर १९४३ में ‘आर्जी हुकूमत-ए-आजाद हिंद’ — अर्थात् स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार — की स्थापना की, जो जापान, जर्मनी, इटली सहित नौ देशों द्वारा मान्यता प्राप्त थी। यह सरकार उस समय की दृष्टि से एक क्रांतिकारी और अभूतपूर्व कदम था।

चलो दिल्ली’ — ऑपरेशन U-Go और इम्फाल अभियान

१९४४ के प्रारम्भ में जापानी सेना के सहयोग से आजाद हिंद फौज ने ‘ऑपरेशन U-Go’ के अंतर्गत भारत पर आक्रमण की योजना बनाई। इस अभियान का उद्देश्य था — ब्रिटिश भारत की सीमाओं को तोड़ते हुए इम्फाल और कोहिमा को जीतना और तत्पश्चात् दिल्ली की ओर कूच करना।


नेताजी का नारा था — “चलो दिल्ली!”


आजाद हिंद फौज तीन स्तंभों में विभाजित होकर बर्मा (म्यांमार) से भारतीय सीमा की ओर बढ़ी। इन्हें गाँधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड और आजाद ब्रिगेड के नाम दिए गए थे। इस फौज में केवल पुरुष ही नहीं, रानी झाँसी रेजिमेंट की वीरांगनाएँ भी कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रही थीं। यह संसार के सैन्य इतिहास में महिलाओं की पहली सशस्त्र टुकड़ी में से एक थी।

१४ अप्रैल १९४४: मोइरंग में तिरंगे का उदय

मार्च-अप्रैल १९४४ में आजाद हिंद फौज की अग्रिम टुकड़ियाँ मणिपुर की धरती पर पहुँच गईं। कर्नल शौकत मलिक के नेतृत्व में INA के सैनिकों ने मोइरंग नगर पर अधिकार कर लिया। और फिर आया वह स्वर्णिम क्षण —
१४ अप्रैल १९४४ को मोइरंग के लोकतक झील के तट पर, उस पावन भारतीय भूमि पर, आजाद हिंद फौज का तिरंगा फहराया गया।यह वह तिरंगा था जिसे नेताजी ने स्वयं डिज़ाइन किया था — नारंगी, श्वेत और हरे रंग के बीच उछलते हुए एक बाघ का प्रतीक, जो स्फूर्ति, शक्ति और स्वाभिमान का प्रतिनिधित्व करता था।यह भारतीय भूमि पर किसी भारतीय सेना द्वारा फहराया गया पहला स्वतंत्र राष्ट्रीय ध्वज था। दशकों की दासता के बाद, किसी स्वदेशी सेना ने अपनी ही भूमि पर अपना झंडा गाड़ा था। उस क्षण की अनुभूति कितनी अवर्णनीय रही होगी — इसकी कल्पना मात्र से हृदय भर आता है।

मोइरंग का सांस्कृतिक और भौगोलिक महत्त्व

मोइरंग केवल एक भौगोलिक बिंदु नहीं था। यह मणिपुर की संस्कृति और परंपरा का अभिन्न अंग रहा है। लोकतक झील — भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील — के निकट बसा यह नगर, प्राचीन मीतेई संस्कृति का पवित्र केंद्र है। इसी भूमि पर मणिपुरी देवता थांगजिंग का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।इस भूमि पर तिरंगे का फहराना केवल एक सैन्य विजय नहीं थी, यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा का जागरण था। उत्तर-पूर्व भारत की यह भूमि, जो अपनी भिन्न भाषा, संस्कृति और परंपराओं के बावजूद भारतमाता का अविभाज्य अंग थी, उस दिन राष्ट्रीय स्वाधीनता के स्वप्न की साक्षी बनी।

अदम्य साहस और असीम बलिदान

इस अभियान में आजाद हिंद फौज के सैनिकों ने जो कष्ट सहे, वे वर्णनातीत हैं। घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और अविरल वर्षा के बीच, भोजन-जल की भीषण कमी के साथ, ये सैनिक आगे बढ़ते रहे। मलेरिया, पेचिश और घावों से जर्जर शरीर लेकर भी उनके हौसले अटूट रहे।यह केवल सैनिक नहीं थे — ये डॉक्टर थे, शिक्षक थे, किसान थे, व्यापारी थे। देश-विदेश में बसे वे भारतीय जिन्होंने अपना सुख-चैन, अपनी संपत्ति, और कभी-कभी अपने प्राण भी, स्वतंत्र भारत के स्वप्न की वेदी पर अर्पित कर दिए।कर्नल शौकत मलिक, मेजर जनरल शाहनवाज खान, कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों — ये नाम इस गाथा के नायक हैं। इनके साथ थीं कैप्टन लक्ष्मी सहगल जो रानी झाँसी रेजिमेंट का नेतृत्व कर रही थीं — एक महिला योद्धा जिनका नाम भारतीय इतिहास में अमर है।

इम्फाल और कोहिमा के युद्ध में अंततः मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने जापान और INA को पीछे धकेल दिया। मानसून, रसद की कमी, और ब्रिटिश वायुशक्ति की श्रेष्ठता के सामने यह अभियान रुक गया। मोइरंग भी पुनः ब्रिटिश नियंत्रण में चला गया।इतिहासकार मानते हैं कि इम्फाल-कोहिमा का युद्ध और आजाद हिंद फौज का संघर्ष — भले ही सैन्य दृष्टि से असफल रहा — भारतीय सेना में बीज-विद्रोह का कारण बना। १९४६ के नौसेना विद्रोह और देश भर में उठे जन-आंदोलनों के पीछे INA की प्रेरणा थी। ब्रिटिश सरकार को यह आभास हो गया था कि अब भारतीय सैनिकों और जनता पर शासन करना संभव नहीं रहा।नेताजी की आजाद हिंद फौज ने वह बीज बोया, जिसकी फसल १५ अगस्त १९४७ को काटी गई।

मोइरंग में स्मृति का संरक्षण

आज मोइरंग में INA मेमोरियल स्थित है — एक छोटा परंतु गौरवशाली संग्रहालय, जो उस ऐतिहासिक क्षण की स्मृतियों को संजोए हुए है। यहाँ आजाद हिंद फौज के सैनिकों के शस्त्र, वेशभूषा, पत्र और दस्तावेज सुरक्षित हैं। प्रतिवर्ष १४ अप्रैल को यहाँ मोइरंग दिवस मनाया जाता है।दुर्भाग्यवश, यह तिथि उस व्यापक राष्ट्रीय सम्मान की अधिकारी है जो उसे मिलनी चाहिए। नई पीढ़ी को इस दिवस से परिचित कराना, स्कूलों और महाविद्यालयों में इसे स्मरण करना, और इस महागाथा को पाठ्यपुस्तकों में उचित स्थान देना — यह हमारा राष्ट्रीय दायित्व है।

नेताजी का आदर्श: सर्वधर्म समभाव और राष्ट्रीय एकता

आजाद हिंद फौज की एक और असाधारण विशेषता थी — इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सभी धर्मों और प्रांतों के सैनिक एकजुट थे। सुभाष चंद्र बोस ने इसे जानबूझकर भारत की बहुलतावादी संस्कृति का प्रतिबिंब बनाया था। उनके लिए भारतीयता ही सर्वोच्च पहचान थी।उनकी आजाद हिंद सरकार का आदर्श वाक्य था — “एकता, विश्वास, त्याग।” ये तीन शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

मोइरंग दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना की वर्षगाँठ नहीं है। यह उस असीम राष्ट्रप्रेम का स्मरण है जिसने साधारण मनुष्यों को असाधारण योद्धा बना दिया। यह उस विश्वास का उत्सव है जो यह कहता था कि परतंत्रता में जीना स्वीकार्य नहीं — चाहे इसके लिए कितना भी बड़ा मूल्य चुकाना पड़े।


१४ अप्रैल १९४४ को मोइरंग की धरती पर जो तिरंगा लहराया, वह केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं था। वह उन हजारों सैनिकों के रक्त, स्वेद और स्वप्नों से बुना हुआ था जिन्होंने माँ भारती की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।आज जब हम स्वतंत्र भारत में साँस लेते हैं, जब हम अपने संविधान के तहत अधिकारों का उपभोग करते हैं, तब हमें स्मरण रखना चाहिए — इस स्वतंत्रता की नींव में मोइरंग की वह मिट्टी भी है, जिसे आजाद हिंद फौज के वीरों के पसीने ने सींचा था।

उन अमर शहीदों को शत-शत नमन।
“याद रखो, ये मेरी आखिरी इच्छा है कि भारत स्वतंत्र हो।”
— नेताजी सुभाष चंद्र बोस

वरुण कुमार
वरिष्ठ स्तंभकार
अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद, जमशेदपुर

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