सच उजागर करने की कीमत 5 करोड़! क्या मानहानि के मुकदमे से दबाई जाएगी पत्रकारिता की आवाज?

भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ ने कार्रवाई को पत्रकारों की आवाज दबाने का प्रयास बताया, राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक पांडे समेत पदाधिकारियों ने जताई नाराजगी

नई दिल्ली। जनहित से जुड़े मुद्दों को लेकर खोजी पत्रकारिता करने वाले स्वतंत्र मीडिया संस्थानों के सामने कानूनी चुनौतियों का मामला एक बार फिर चर्चा में है। ‘सच की रफ्तार’ समाचार पत्र एवं डिजिटल न्यूज चैनल के मुख्य संपादक धर्मवीर जारवाल के खिलाफ PST Gems Private Limited की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में पांच करोड़ रुपये का मानहानि मुकदमा दायर किए जाने के बाद पत्रकार संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ (BSPS) ने इसे पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर दबाव बनाने का प्रयास बताते हुए विरोध जताया है।

मामले की शुरुआत कंपनी के उत्पादों को लेकर उठाए गए सवालों से जुड़ी बताई जा रही है। आरोप है कि अधिवक्ता मोहित की ओर से ड्रग विभाग में शिकायत की गई थी कि कंपनी द्वारा टाडालाफिल (Tadalafil) नामक एलोपैथिक दवा को आयुर्वेदिक उत्पाद के रूप में बेचा जा रहा है। शिकायत और उत्पाद से जुड़े कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर ‘सच की रफ्तार’ सहित अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खबरें प्रसारित की गईं।

मीडिया संस्थान की ओर से दावा किया गया है कि खबरें प्रसारित होने के बाद यूट्यूब पर चैनल के खिलाफ 14 से अधिक कॉपीराइट स्ट्राइक दर्ज कराई गईं। हालांकि, चैनल के अनुसार बाद में ये स्ट्राइक हटा दी गईं और संबंधित वीडियो दोबारा उपलब्ध हो गए। इसके बाद कंपनी की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में पांच करोड़ रुपये के मानहानि हर्जाने का दावा दायर किया गया।

इस घटनाक्रम को लेकर पत्रकारिता जगत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और खोजी पत्रकारिता की सुरक्षा पर बहस तेज हो गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या बड़े आर्थिक दावों और कानूनी कार्रवाई के माध्यम से छोटे मीडिया संस्थानों पर दबाव बनाया जा सकता है?

पत्रकारों की आवाज दबाना लोकतंत्र के लिए चिंताजनक: अशोक पांडे

भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक पांडे ने पांच करोड़ रुपये के मानहानि दावे पर नाराजगी जताते हुए कहा कि सीमित संसाधनों में काम करने वाला पत्रकार आम जनता की समस्याओं और जनहित के मुद्दों को सामने लाता है। यदि ऐसे पत्रकारों को न्यायालय और मुकदमों के जरिए प्रताड़ित किया जाएगा, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने भी जताया विरोध

संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव गिरिधर शर्मा ने कहा कि कानूनी दांव-पेचों के जरिए पत्रकारों की आवाज दबाने की कोशिश निंदनीय है। वहीं, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शैलेश्वर पांडा ने कहा कि पत्रकारों को निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, न कि उन्हें सवाल उठाने पर कानूनी नोटिसों का सामना करना पड़े।

संघ के संस्थापक शहनवाज हसन ने कहा कि पत्रकारों का शोषण लगातार चिंता का विषय बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा देने मात्र से उसकी आवाज को खामोश नहीं किया जा सकता।

कानूनी और सामाजिक स्तर पर लड़ाई लड़ेगा संगठन

भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ ने स्पष्ट किया है कि ‘सच की रफ्तार’ और उसके दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष धर्मवीर जारवाल से जुड़े इस मामले को संगठन गंभीरता से ले रहा है। संघ ने कहा कि पत्रकारों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी एवं सामाजिक स्तर पर आवाज उठाई जाएगी। संगठन ने चेतावनी दी है कि पत्रकारों पर दबाव बनाने की ऐसी घटनाएं नहीं रुकीं तो देशव्यापी विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।

न्यायालय के फैसले पर टिकी निगाहें

फिलहाल पांच करोड़ रुपये का मानहानि मामला दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन बताया गया है। ऐसे में मामले के सभी पहलुओं पर न्यायालय का निर्णय महत्वपूर्ण होगा। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार भी महत्वपूर्ण है। लेकिन यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि मानहानि कानून का इस्तेमाल जनहित में सवाल उठाने वाली पत्रकारिता को हतोत्साहित करने के लिए न हो।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या करोड़ों रुपये के मानहानि मुकदमे स्वतंत्र पत्रकारिता की रफ्तार रोक पाएंगे या तथ्य और निष्पक्षता के आधार पर उठाई गई आवाज लोकतंत्र में अपनी जगह बनाए रखेगी?

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