हत्या ने उजागर की ODF दावों की हकीकत, महिलाएं बोलीं- आज भी खुले में शौच को मजबूर

हत्या ने उजागर की योजनाओं की जमीनी हकीकत, गांव की महिलाएं बोलीं- हम अब भी असुरक्षित हैं

कागजों में ODF, हकीकत में खुले में शौच, आखिर कब तक जाती रहेंगी जानें?

महिलाओं ने उठाए सुरक्षा और स्वच्छता पर सवाल, प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग

अलीगंज साडरपुर गांव में 24 वर्षीय आशीष की हत्या ने केवल एक परिवार का चिराग नहीं बुझाया, बल्कि उन सरकारी दावों की परतें भी उधेड़ दी हैं जिनमें गांवों को खुले में शौच मुक्त ओडीएफ बताया जाता है। जिस गांव में आज भी अधिकांश परिवार शौच के लिए खेतों और सुनसान रास्तों पर जाने को मजबूर हैं, वहां एक युवक की जान चली गई। अब गांव की महिलाएं सवाल उठा रही हैं कि अगर हर घर में शौचालय होता तो क्या यह हादसा होता?

हत्या के बाद गांव में शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है। जिन रास्तों पर कभी महिलाएं और पुरुष शौच के लिए जाते थे, वहां अब डर का पहरा है। लोग बच्चों और महिलाओं को रात में घर से बाहर नहीं निकलने दे रहे। गांव के लोगों का कहना है कि ओडीएफ के दावे सिर्फ फाइलों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। ग्रामीणों का आरोप है कि 1500 कि आबादी बाले गांव को कागजों में खुले में शौच मुक्त दिखाकर जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली, लेकिन हकीकत में न तो पर्याप्त शौचालय बने और न ही लोगों को उनकी सुविधा मिली। आज भी कई परिवार बुनियादी सुविधा से वंचित हैं।

यह सिर्फ हत्या नहीं, बल्कि विकास योजनाओं की विफलता है


आशीष हत्याकांड के बाद अब गांव में एक नई बहस छिड़ गई है। लोग इसे सिर्फ हत्या नहीं, बल्कि विकास योजनाओं की विफलता से जोड़कर देख रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक गांव में शौचालयों का निर्माण नहीं होगा, तब तक महिलाएं और बुजुर्ग जोखिम उठाने को मजबूर रहेंगे।

हत्यारों की हो गिरफ्तारी और जरूरतमंद परिवार को मिले शौचालय
साडरपुर गांव वालों ने प्रशासन से दो टूक मांग रखी है, पहली आशीष हत्याकांड का जल्द से जल्द खुलासा कर आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए। दूसरी गांव में तत्काल सर्वे कराकर प्रत्येक जरूरतमंद परिवार को शौचालय उपलब्ध कराया जाए। साडरपुर आज एक सवाल बनकर खड़ा है क्या ओडीएफ के प्रमाण पत्र किसी गांव को वास्तव में खुले में शौच मुक्त बना देते हैं, या फिर जमीनी हकीकत देखने की जरूरत है? आशीष की मौत के बाद यह सवाल केवल उसके परिवार का नहीं, बल्कि पूरे गांव की आवाज बन गया है।

क्या कहना है महिलाओं का


गांव की महिला श्रीमती अनीता ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा, अधिकारी आते हैं, कागज बनते हैं और गांव को ओडीएफ बता दिया जाता है, लेकिन कोई यह नहीं देखता कि लोगों के घरों में शौचालय हैं भी या नहीं। अगर आशीष को अपनी पत्नी को शौच के लिए बाहर न ले जाना पड़ता तो शायद आज वह हमारे बीच होता।

रामवती देवी ने आंखें नम करते हुए कहा कि रात में बाहर निकलने से पहले अब डर लगता है। पहले भी असुरक्षा थी, लेकिन अब तो ऐसा लगता है जैसे हर अंधेरे में कोई खतरा छिपा बैठा है। सरकार महिलाओं की सुरक्षा की बात करती है, लेकिन सुरक्षा की शुरुआत घर के शौचालय से होती है।

आशा देवी का कहना है कि साडरपुर में गिने-चुने चार-पांच शौचालय बने हैं। उनमें भी कई अधूरे हैं। बाकी लोग आज भी खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। जब योजनाएं धरातल पर नहीं उतरतीं तो उसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ता है। आशीष की मौत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

कमलेश देवी का दर्द व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा करता है। उन्होंने कहा हम महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशानी होती है। दिन में शर्म और रात में डर। अब हत्या के बाद तो डर कई गुना बढ़ गया है। अगर गांव में हर घर में शौचालय बना होता तो किसी को रात में बाहर नहीं जाना पड़ता। आखिर हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?

बीडीओ शिव शंकर शर्मा ने बताया कि ग्राम साडरपुर में शौचालय विहीन पात्र परिवारों को चिन्हित करने के लिए एडीओ पंचायत को निर्देशित किया गया है। इसके लिए विशेष कैंप लगाकर पात्र लोगों का चयन कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि जिन परिवारों के पास शौचालय नहीं हैं, उनका ऑनलाइन पंजीकरण कराया जाएगा ताकि उन्हें शासन की योजना का लाभ मिल सके। बीडीओ ने बताया कि इच्छुक नागरिक स्वयं भी ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। पात्रता की जांच के बाद नियमानुसार लाभ प्रदान किया जाएगा।

दिलीप सिंह 

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